मेरी जिंदगी

on Tuesday 28 April 2009

काश के मुझे तुमसे प्रेम ना हुआ होता,
तुम जानती हो मेरे कितने काम बढ़ गए हैं,
मुझे रोज़ तुम्हारे बारे में सोचना होता है , तुमसे बात करने होती है।
तुम हो, चाहे ना हो,
मै तुम्हे कब से देखना चाहता हूँ,
बल्कि रोज़ देखना चाहता हूँ,
पर एक तुम हो
तुम अपने घर पर एक जायज़ बहाना नहीं कर सकतीं,
मुझसे बात नहीं कर सकतीं.
तुम्हारे साथ जिंदगी,
खूबसूरत है,
खूबसूरत होगी,
मैंने ऐसा ही सोचा है,
रोज़ सोचता हूँ।

चाँद रात

on Tuesday 14 April 2009

तो कल रात आप फिर नही सोए ,

वही पुराने तारों को देखते रात गुजारी ,

आया वो तेरा चाँद

नही ना !

नही आएगा

वो भी कहीं तेरा इंतज़ार कर रहा था ,

कहीं किसी बद्री मैं छुपा

किसी झाडी मैं फंसा ,

दर्द तो उसे भी हुआ होगा

झाडी मैं काँटों का ,

डर तो उसे भी लगा होगा

बदल मैं अंधेरे का

क्या सोचता है

की वो दिन मैं सोया होगा ,

तेरे बिन वो अंगडाइयां ले रहा होगा ,

बदल रहा होगा वो करवटें बार बार ,

इस धुप के बाद भी कोशिश करता है तुझे देखने की

तू भी बड़ा जालिम है ,

रात भर तो जागेगे

और फिर ख़ुद ही गायब हो जायेगा

देख उसे

कितनी तपिश झेल रहा है

रात दिन तेरी ही राह देख रहा है

उसे देखकर लगता ही नही की चैन मिला है

अब तो वोह तेरी ही तरह दिखने लगा है ,

तेरे ही रंग मैं रंगने लगा है

तेरी हर याद है उसके ज़हन मैं

वो याद करता है ,

तेरा वो गिर गिर के संभालना ,

वोह संभल संभल के गिरना

वोह रूठ रूठ के बिगड़ना ,

वोह बिगड़ बिगड़ के रूठना

वो एक कहने पे सारी बातें कहना ,

वो तेरा दर्द देके उसको रुलाना ,

वो रूठना मानना ,

वो बातें बनाना ,

वो अपना बता के दूजों से मिलाना

वो तेरा बातें बदलना

वो बातें घुमाना

एक तू है जिसे कुछ याद ही नही सिवा उसकी याद के ,

तुझे याद है तुने किया था कुछ वादा ,

क्या था वो तेरा इरादा ,

कहा था बीत पायेगा ये खुशनुमा मौसम ,

अब कहता है फिर आएगा वो मौसम ,

तेरी इसी वादा खिलाफी से वो परेशान है ,

फिर भी वो कहता है तू मेरी जान है

मैंने उससे भी बात की है

वो कहता है 'उसके सिवा कुछ समझ नही पता ,

वो तो दिल मैं रहने वालों को नही समझ पता '

कुछ और रातें बाकी हैं अब वो ना सोएगा ,

पर ये मत समझना की वो कभी रोएगा ,

दिल मैं जगह तो तेरे बना ही ली है

मुकाम जो पाना था वो पा ही लिया है , अब क्या फर्क पड़ता है साथ होने का

नशा और खुमारी तो छा ही गई है , गम नही जाम हाथ होने का

जाने क्यूँ लगता है की तुझे गम ही नही ,

पर तेरे सेहरा मैं तो आंसू मुझे दीखते कम नही ,

अब तो मैं भी आँख मिचौली से अंग गया हूँ ,

तेरी इन बातों पे तेरे संग गया हूँ

"कर अगर कुछ तो मिटने की आस रख ,

कहाँ मिली है किसी नदी को समंदर से बेवफाई "

ना जाने कहाँ खो गई

on Sunday 12 April 2009



आज हम इतने आगे बाद गए हैं की पीछे छुते अपने ही पैरों के निशानों को पहचाना शायद अमर लिए मुश्किल होता जा रहा है । हरिवंश राय बच्चन मधुशाला मैं एक जगह कहते हैं , 'बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनती यौवन का ', हम तो भूल ही गए है की बुलबुल की आवाज़ मैं मिठास भी होती है , पानी मैं गहराई तक और ११.१ % महंगाई तक तो हम पहुँच गए है पर एक भाई का अपनी भौजाई तक से रिश्ता दूर खोता जा रहा है । गाडरवारा से आए एक कवि श्री भारत भूषण जी की एक रचना यहाँ प्रस्तुत है परिचय मैं पहले ही करा चुका हूँ ।
ना जाने कहाँ गया ,
निश्छलता का भावः ,
अपने पन की गहराई ,
हर्षित होती आंखें
देख घटाएं सावन की
शिखर छुते पेड़
देख अभिमान से भर
भर उठते ह्रदय
की अन्तः खुशी
निर्जीवता को भी
अपनत्व का मधु
घोलकर
समाहित कर देती थी
संजीवता के
आभास मैं
अनजान के लिए
आंखों से आंसुओ
का दान
दर्द को दर्द की पहचान
ना जाने कहाँ खो गई ???
फिर मिलेंगे !

मेरा ये दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है

on Saturday 11 April 2009

ये दौर जिंदगी का ना जाने क्यूँ बदलता है ,
मेरा दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है ।

उस ज़माने मैं हमने लाख तारे तोडे हैं ,
अब इस ज़माने ने हमे तोड़ रखा है ।

वो क्या आदयें थीं अपनी इतराने की ,
अब अपनी आदाओं को हमने ही भुला रखा है ।

पूरी करी थीं ना जाने कितनो की मुरादें ,
अब अपनी ही मुरादों को तकिए से दबा रखा है ।

मुझसे गलती जो हुई तो माफ़ मुझको सब ने किया ,
अब मेरी गलतियों को ही अपना मंसूबा बना रखा है ।

जो मेरे दिल को बेच दिया था मैंने पैसों मैं ,
अब मेरे दिल को ही मैंने पैसों सा बना रखा है ।

जो हर रह गुज़रती थी मेरे घर से होकर ,
अब मेरा घर ही मैंने किनारे पर बिठा रखा है ।

की मुझे आज भी कोई उस दौर से याद करता है ,
मेरा ये दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है ।

यह सफर किस डगर

on Sunday 1 March 2009


आज मैं आपका परिचय मेरे मित्र कवि से कराने जा रहा हूँ , श्री भारत भूषण तिवारी जी ,इनका जन्म नरसिंह पुरके गाडरवारा तहसील में १२ जनवरी १९७५ को हुआ , उन्होंने अपनी स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई वहाँ से की , आजकल भोपाल में नौकरी ढूँढ रहे हैं , ह्रदय कवि हैं अलग अलग मुद्दों पर अलग अलग समय पर इनकी कवितायेंअख़बारों में लगती रहती है ,पर कम्बक्थ इनसे पेट ही नही भरता ,अब नॉर्वेगियन लेखक क्नुत हमसून के नोवेलके नायक की तरह भी हो पाना मुश्किल है जो सोच लेता है के खाऊंगा तो लिख के ही , जीवन का सघर्ष काकठिन होता जा रहा है Hunger ओर उनका यह मानना यह भी है की जीवन में कुछ करते रहना जरूरी है यहाँ उनकी एककविता लिख रहा हूँ कैसे लगी बताएं , उन्हें ओर मुझे प्रोत्साहन मिलेगा


यह सफर किस डगर

मगर , क्यूँ चला

बेखबर मन की लहर

अमृत या ज़हर

पीता चला ,

कहीं फुहार अपनेपन की

बेगाना भी कुछ लगा

खींचती है डोर कोई

खींचता बे मन कदमो का काफिला ,

सच तो है उसकी सत्ता

बस मान लेगा एक दिन ,

चला 'भारत ' उसकी ओर खींचता चला

तुम्हारे जाने का डर

on Sunday 1 February 2009

तुम गए, दरवाज़ा क्यूँ खुला छोड़ दिया तुमने
मुझे जाने दिया होता ,दरवाज़ा बंद किया होता ।
मुझे चोरी का डर तो नही होता ,
मुझे डर तो नही होता,
मुझे डर है इसका नही की मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है ।
पर डर है की तुम जो वापस प् आए तो मैं कहाँ रहूँगा ।
तुम्हे छोड़ आया हूँ तो लगता है की रोक लेना था
की तुम्हारे घर का दरवाज़ा मुझसे नही लगता

हाय ! वो राजदार

on Friday 30 January 2009

इक पल लगा मुझको सपना सच हुआ होगा ,
मैंने पाया ,उसने पाया कुछ न कभी खोया होगा ।
जाने कैसे इतनी बातें दिल मैं दबाना सीखी होंगी ,
कुछ तो होंगे लोग जो राजदार कहलाते होंगे ,
और वो उससे मिले बिना कैसे रह पते होंगे ,
कहने को तो शब्द नही पर बातें भोलो भली हैं ।
सब कुछ उसको मालूम है ,पर कहती है की आधी है ।
उसकी आंखें मुझसे जाने क्या क्या तो कह जाती है ,
पर मेरी आँखें भी उसके लफ्जों के लिए रुक जाती है ।
मेरे जैसे पागल न जाने कितने और होंगे ,
जो कहते होंगे उसको की की आँखों से कुछ कहती है ।
छोटी भी है और बड़ी भी ,वो सबको प्यार जताती है
पर न जाने किसके सपनो मैं सच मैं आती है ।