ना जाने कहाँ खो गई

on Sunday, April 12, 2009



आज हम इतने आगे बाद गए हैं की पीछे छुते अपने ही पैरों के निशानों को पहचाना शायद अमर लिए मुश्किल होता जा रहा है । हरिवंश राय बच्चन मधुशाला मैं एक जगह कहते हैं , 'बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनती यौवन का ', हम तो भूल ही गए है की बुलबुल की आवाज़ मैं मिठास भी होती है , पानी मैं गहराई तक और ११.१ % महंगाई तक तो हम पहुँच गए है पर एक भाई का अपनी भौजाई तक से रिश्ता दूर खोता जा रहा है । गाडरवारा से आए एक कवि श्री भारत भूषण जी की एक रचना यहाँ प्रस्तुत है परिचय मैं पहले ही करा चुका हूँ ।
ना जाने कहाँ गया ,
निश्छलता का भावः ,
अपने पन की गहराई ,
हर्षित होती आंखें
देख घटाएं सावन की
शिखर छुते पेड़
देख अभिमान से भर
भर उठते ह्रदय
की अन्तः खुशी
निर्जीवता को भी
अपनत्व का मधु
घोलकर
समाहित कर देती थी
संजीवता के
आभास मैं
अनजान के लिए
आंखों से आंसुओ
का दान
दर्द को दर्द की पहचान
ना जाने कहाँ खो गई ???
फिर मिलेंगे !

3 comments:

Udan Tashtari said...

श्री भारत भूषण जी की कविता पढ़वाने का आभार. बहुत बढ़िया है.

प्रभाकर पाण्डेय said...

sundar prastuti> aabhaar>

parikshit said...

sabse pahle to apko dhanyevad ke is nakkarkhane mai apne is vichar ko janam diya ............. ab mai kahana chahunga ki bhushan ji humne jabse dunia ko smagha bus ek hi nishkarsh nikala ki hamare hath mai sirf prayas hai hum sirf prayas kar sakte hai or aapka prayas sarahniy hai

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आपके उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद्