मेरा ये दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है

on Saturday, April 11, 2009

ये दौर जिंदगी का ना जाने क्यूँ बदलता है ,
मेरा दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है ।

उस ज़माने मैं हमने लाख तारे तोडे हैं ,
अब इस ज़माने ने हमे तोड़ रखा है ।

वो क्या आदयें थीं अपनी इतराने की ,
अब अपनी आदाओं को हमने ही भुला रखा है ।

पूरी करी थीं ना जाने कितनो की मुरादें ,
अब अपनी ही मुरादों को तकिए से दबा रखा है ।

मुझसे गलती जो हुई तो माफ़ मुझको सब ने किया ,
अब मेरी गलतियों को ही अपना मंसूबा बना रखा है ।

जो मेरे दिल को बेच दिया था मैंने पैसों मैं ,
अब मेरे दिल को ही मैंने पैसों सा बना रखा है ।

जो हर रह गुज़रती थी मेरे घर से होकर ,
अब मेरा घर ही मैंने किनारे पर बिठा रखा है ।

की मुझे आज भी कोई उस दौर से याद करता है ,
मेरा ये दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है ।

6 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पूरी करी थीं ना जाने कितनो की मुरादें ,
अब अपनी ही मुरादों को तकिए से दबा रखा है ।

अच्छा लिखा है जी

Advocate Rashmi saurana said...

पूरी करी थीं ना जाने कितनो की मुरादें ,
अब अपनी ही मुरादों को तकिए से दबा रखा है ।
bhut sundar.likhate rhe.

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया-जारी रहिये.

डॉ .अनुराग said...

की मुझे आज भी कोई उस दौर से याद करता है ,
मेरा ये दिल भी बस मुफलिसी मैं ही मचलता है ।
vah bahut badhiya.

pallavi trivedi said...

पूरी करी थीं ना जाने कितनो की मुरादें ,
अब अपनी ही मुरादों को तकिए से दबा रखा है ।
kya bat hai...bahut khoob.

shweta.jit said...

yaade kabhi purani nahi hoti,
na chahte huye bhi begani nahi hoti.
akksar hum kho jate hai in me.
kyoki inke bina meri kahani kuchh nahi hai!
.....................aapne bahut achchha likha hai apne bhavo ko!!

Post a Comment

आपके उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद्