चाँद रात

on Tuesday, April 14, 2009

तो कल रात आप फिर नही सोए ,

वही पुराने तारों को देखते रात गुजारी ,

आया वो तेरा चाँद

नही ना !

नही आएगा

वो भी कहीं तेरा इंतज़ार कर रहा था ,

कहीं किसी बद्री मैं छुपा

किसी झाडी मैं फंसा ,

दर्द तो उसे भी हुआ होगा

झाडी मैं काँटों का ,

डर तो उसे भी लगा होगा

बदल मैं अंधेरे का

क्या सोचता है

की वो दिन मैं सोया होगा ,

तेरे बिन वो अंगडाइयां ले रहा होगा ,

बदल रहा होगा वो करवटें बार बार ,

इस धुप के बाद भी कोशिश करता है तुझे देखने की

तू भी बड़ा जालिम है ,

रात भर तो जागेगे

और फिर ख़ुद ही गायब हो जायेगा

देख उसे

कितनी तपिश झेल रहा है

रात दिन तेरी ही राह देख रहा है

उसे देखकर लगता ही नही की चैन मिला है

अब तो वोह तेरी ही तरह दिखने लगा है ,

तेरे ही रंग मैं रंगने लगा है

तेरी हर याद है उसके ज़हन मैं

वो याद करता है ,

तेरा वो गिर गिर के संभालना ,

वोह संभल संभल के गिरना

वोह रूठ रूठ के बिगड़ना ,

वोह बिगड़ बिगड़ के रूठना

वो एक कहने पे सारी बातें कहना ,

वो तेरा दर्द देके उसको रुलाना ,

वो रूठना मानना ,

वो बातें बनाना ,

वो अपना बता के दूजों से मिलाना

वो तेरा बातें बदलना

वो बातें घुमाना

एक तू है जिसे कुछ याद ही नही सिवा उसकी याद के ,

तुझे याद है तुने किया था कुछ वादा ,

क्या था वो तेरा इरादा ,

कहा था बीत पायेगा ये खुशनुमा मौसम ,

अब कहता है फिर आएगा वो मौसम ,

तेरी इसी वादा खिलाफी से वो परेशान है ,

फिर भी वो कहता है तू मेरी जान है

मैंने उससे भी बात की है

वो कहता है 'उसके सिवा कुछ समझ नही पता ,

वो तो दिल मैं रहने वालों को नही समझ पता '

कुछ और रातें बाकी हैं अब वो ना सोएगा ,

पर ये मत समझना की वो कभी रोएगा ,

दिल मैं जगह तो तेरे बना ही ली है

मुकाम जो पाना था वो पा ही लिया है , अब क्या फर्क पड़ता है साथ होने का

नशा और खुमारी तो छा ही गई है , गम नही जाम हाथ होने का

जाने क्यूँ लगता है की तुझे गम ही नही ,

पर तेरे सेहरा मैं तो आंसू मुझे दीखते कम नही ,

अब तो मैं भी आँख मिचौली से अंग गया हूँ ,

तेरी इन बातों पे तेरे संग गया हूँ

"कर अगर कुछ तो मिटने की आस रख ,

कहाँ मिली है किसी नदी को समंदर से बेवफाई "

19 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया है, जरुर मिलेंगे फिर.

sourabh said...

ekdum jhakas bhai, age raho.
maja aa gaya.

Advocate Rashmi saurana said...

sundar rachana ke liye badhai. jari rhe.

Amit K Sagar said...

बहुत खूब. "जीवन एक ही कविता को दोबारा लिखने का मौका क्यों नही देता है ?" बहुत खूब. शुक्रिया. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर

jayaka said...

Jaise ki ek phool, ek baar hi khilata hai...waise hi ek mauka to ek baar hi aata hai!.....afassos ki hum kuchh nahi kar sakaten!... vaichaarik prishthhbhoomi ki sunder kavita!

d said...

nahi aaya chand...jaane kab aayega. Badhiya likha aapne. badhayi saweekare

mark rai said...

बहुत खूब. शुक्रिया...kaaphi achchhi kavita ...ander se udgaar nikla ...aisa pratit hota hai ..

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"जीवन एक ही कविता को दोबारा लिखने का मौका क्यों नही देता है" रचना बहुत अच्छी लगी।कुछ हटकर.....

Harkirat Haqeer said...

अच्छी श्ब्द्व्यन्जना .....टिप्पण की गलतियों को सुधारे ....अगली बार एक बेहतर नज़्म की उम्मीद है.....!!

Kranti said...

bahot badhiya.

ज्योति सिंह said...

bahut sundar rachana .achchaa likhte hai .

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत खूब.....

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर भाव लिये आप की यह कविता.

Neha said...

kavita ke bhaav to bahut hi acche hain...maaf kijiyega par ye baat jaroor kahna chahoongi ki kai jagah par lekhan me maatraaon ki galti hai....agar aap likhne ke baad jara padh kar post karen to ye bahut hi acchi ho jaayengi aur ye sone pe suhaaga ki tarah kaam karengi....baat ko ek dost ki tarah kaha hai ise anyatha na len....bura lage to maaf karen

Neha said...
This comment has been removed by the author.
kumar Dheeraj said...

गली में आज चांद निकला । क्या खूबसूरत गजल है । चाद के कितने रूप है औऱ चांद की कितनी महिमा है हमलोग वाकिफ है । आपका ये सुन्दर सी कविता भी उसी की औऱ इशारा करती है । बेहद खूबसूरत है आपका चांद । शुक्रिया

संजीव गौतम said...

अच्छा लिखते हैं आप.

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी लगी ये कविता सही है जीवन फिर से उस कविता को लिखने का अवसर नही देता। भावमय रचना है।
आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई शुभकामनायें

E-Guru Rajeev said...

आय गजब !!
का लिखते हो डूबे जी !!
छा गये गुरु !!
जाओ झाडी से छुडाय दयो, चंदवा का अपने अड्डे पहुंचना बहुते जरूरी है.

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आपके उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद्