Sunday, February 1, 2009

तुम्हारे जाने का डर

तुम गए, दरवाज़ा क्यूँ खुला छोड़ दिया तुमने
मुझे जाने दिया होता ,दरवाज़ा बंद किया होता ।
मुझे चोरी का डर तो नही होता ,
मुझे डर तो नही होता,
मुझे डर है इसका नही की मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है ।
पर डर है की तुम जो वापस प् आए तो मैं कहाँ रहूँगा ।
तुम्हे छोड़ आया हूँ तो लगता है की रोक लेना था
की तुम्हारे घर का दरवाज़ा मुझसे नही लगता

Friday, January 30, 2009

हाय ! वो राजदार

इक पल लगा मुझको सपना सच हुआ होगा ,
मैंने पाया ,उसने पाया कुछ न कभी खोया होगा ।
जाने कैसे इतनी बातें दिल मैं दबाना सीखी होंगी ,
कुछ तो होंगे लोग जो राजदार कहलाते होंगे ,
और वो उससे मिले बिना कैसे रह पते होंगे ,
कहने को तो शब्द नही पर बातें भोलो भली हैं ।
सब कुछ उसको मालूम है ,पर कहती है की आधी है ।
उसकी आंखें मुझसे जाने क्या क्या तो कह जाती है ,
पर मेरी आँखें भी उसके लफ्जों के लिए रुक जाती है ।
मेरे जैसे पागल न जाने कितने और होंगे ,
जो कहते होंगे उसको की की आँखों से कुछ कहती है ।
छोटी भी है और बड़ी भी ,वो सबको प्यार जताती है
पर न जाने किसके सपनो मैं सच मैं आती है ।

मुझे चाँद देखने की फ़िक्र न थी

उस रात तारे ज़मीन पर उतर
कुछ दूर मेरे साथ चले
सब ठण्ड से ठिठुर गए , कहीं
गर्मी के एहसास के लिए ,
गुज़रती हुई ज़िन्दगी का एहसास शायद हुआ था
वह पल तो थम गया
सब थम गया , कुछ हुआ सा था
किसी मोड़ की शुरुआत में
अंत को देखने की ललक सी थी
यह सड़क कहाँ ख़तम होगी
इस बात की महक थी ,
कुछ मलाल थे उस रात के
कुछ गफ्लातों की लत सी थी ,
कोई भले पुकारता हो
आहटों की महक से थी

उस रात ,देर रात मुझे चाँद देखने की फ़िक्र थी

Tuesday, January 27, 2009

मेरा नाविक मेरा साथ

सागर में मेरा कुछ हो ये मेरा था अरमान बड़ा ,
लेकर नैया मैं भी घर से करने गंगा पार चला ,
माझी ने कह दिया था मुझसे मोती तुम्हे दिलाऊंगा ,
कहाँ घुमते रहे किनारे सागर तुम्हे दिखाऊंगा ।
लहरों से झूलोगे तुम बस मेरे ऊपर रखना दम ,
डरो नही तुम चलते जाओ जहाँ कहो ले जाऊंगा
चला गया मैं भी मुरख था ,पता नही मुझे क्या हुआ ,
सुधबुध खोई जाल मैं उसके मैं तो बस चलता गया ,
सोचा मैंने कहूँ कहानी किसी अच्छे से सागर की
पर मेरा नाविक तो मुझको बिच नाव मैं छोड़ कर चला गया ।

Monday, January 26, 2009

जीवन जाल ,जनवरी ०९

जाल बुन रहा हूँ इक ,
यादों का , यादों का ,हाँ यादों का
यादें , शब्दों की दासी नही होतीं ,
कोई आवाज़ नही होती इनकी
ये बस होती हैं ।
या कहूँ की यादें आती हैं ।

मेर इस जाल मैं तीन सुन्हेरे धागे भी हैं ,
और एक सफ़ेद धागा भी इनके बीच
इनका रंग चुराने की कोशिश कर रहा है ।

मैं पूरा धयान रखा हूँ की धागे सही ही चलें
अब ये लगता है की मैं बाँध जाऊँगा
शायद इस जाल मैं साँस भी न ले पाऊंगा
हाँ यही तो मैं चाहता था
बंद होना , दब जाना , थम जाना
नही क्या ।

Sunday, July 13, 2008

चलो अब दूर चलें



चलो अब दूर चलें ,

होने अब हम बे नूर चलें ।
रंग रोगन को हम भी छोडेंगे ,


अलविदा कहने से पहले दूर चलें ।


आओ अंधेरे को हम भी ढूँढेंगे ,


चिराग हाथ मैं लिए बहुत दूर चलें ।


चिराग बुझ ना सके की अँधेरा मिल जाएगा ,


चलो ज़ख्म को बनाने नासूर चलें ।


किसी कोने मैं चल के बैठेंगे ,


किसी आहट से सहमे बैठेंगे ।


सबको भुलाने बदस्तूर चलें ,


चलो अब दूर बहुत दूर चलें ।


चलो के चल के ही मिट जायेंगे ,


कभी रुक ना जाना की थक जायेंगे ।


वापस ना तेरे घर ना मेरे घर जायेंगे ,


कोई ना दिखे इतने दूर चलें ।

चलो अब दूर चलें
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Wednesday, June 25, 2008

शब्दों को जोड़कर यूँ ही

पिछले तीन दिनों से बिल्कुल भी समय नही मिला की कुछ लिखूं और जब समय मिला तो कुछ भी तैयार नही था ,अभी मुझे अपनी एक पुरानी कविता की कुछ पंक्तिया याद आयीं ,पुरी तो नही पर कुछ हिस्सा लिखने की इक्षा है । दिन का ढेर सारा समय हिन्दी ब्लोग्स पड़ने में बीत जाता है , फिर भी कुछ ठोस नही मिल रहा की अपने से कुछ लिख सकूँ , कुछ दिनों पहले रविश जी के ब्लॉग पर मैंने पड़ा उन्होंने विज्ञापन का अंडरवियर काल शीर्षक से एक पोस्ट लिखी थी ,पड़कर बड़ा सुकून हुआ और अपने टीचर श्री मनोहर श्याम चौरे जी की याद आई ,वे बहुत ऊँचे कोटि के पत्रकार रहे हैं , आजकल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय मैं अपनी सेवाएँ दे रहे हैं , वे हमेशा हमें बताते रहते है के लिखने के लिए विषय से ज्यादा जरूरी है इक्षा का होना ,आप के पास हजारों के तादाद मैं विषय होते हैं , सुबह के उठने से लेकर रात को सोने तक ,सुई से तलवार तक और साइकिल से मोटर कार तक ,आप लोगों के ऊपर लिख सकते है ,भगवन को चढाय जाने वाले भोगों के ऊपर लिख सकते है और अगर थोडी ठीकठाक जानकारी रखते हों तो बरसात मैं होने वाले रोगों पर भी लिख सकते हैं ,पर अब तीन साल की पडी के बाद लगता है की सब मट्टी पालित हों गई कुछ भी ढंग का नही सीखा । खैर अभी भी कुछ नही गया है ,बहुत कुछ हों सकता है ,किया जा सकता है ।

वादे के मुताबित अब मैं एक कविता भी लिख रहा हूँ ,मैं जानता हूँ की अभी मैं अच्छा नही लिख पता पर फिर भी मैं कोशिश कर रहा हूँ,ये कविता मैंने काफी पहले कुछ लिखे के ऊपर ही लिखी थी

शब्दों को जोड़कर यूँ ही कुछ कहा जाता है क्या ,

अपना गुस्सा इन शब्दों पर उतरा जाता है क्या ,गलतियाँ ख़ुद करें बड़े आप बने ,

और कहें सारा जहाँ ख़राब है , इससे काम चलता है क्या , बदलावों को महसूस किया शायद ये अच्छा है ,पर अच्छा है महसूस किया ये अच्छा है क्या ।